एक ऐसा मंदिर जहां खुद समुद्र करता है!! “महादेव का जलाभिषेक” – हर दिन हो जाता है गायब!!

शायद आपको सुनने में अचरज लगे, लेकिन एक मंदिर वाकई ऐसा है, जो दिन में दो बार कुछ पल के लिए गायब हो जाता है। और फिर अपने आप ही मूल रूप में आ जाता है। परमपिता शिव का यह मंदिर गुजरात के बड़ोदरा से 85 किलोमीटर दूर भरुच जिले की जम्बूसर तहसील में गाँव ‘कावी’ कम्बोई. समुद्र किनारे स्थित है। भोले बाबा का यह रूप ‘स्तंभेश्वर महादेव’ के रूप में जाना जाता है। वैसे यहाँ के स्थानीय भक्तों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं पर सुदूर के पर्यटकों के लिए खासा रोमांचकारी अनुभव होता है।

समुद्री ज्वार-भाटे के कारण ऐसा होता है:-

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भगवान शिव के इस मंदिर की खोज लगभग 200 साल पहले हुई. इस प्राचीन मंदिर की विशेषता इसका अरब सागर के मध्य कैम्बे तट पर स्थित होना है.  मंदिर के शिव लिंग के दर्शन केवल ‘लो टाइड’ के दौरान ही होते हैं क्योंकि ‘हाई टाइड’ के वक्त यह समुद्र में विलीन हो जाता है. इस समुद्र तट पर दिन में दो बार ज्वार-भाटा आता है. समुद्री ज्वारभाटे के कारण यह शिवालय नियमित रूप से कुछ पलों के जलमग्न हो जाता है और समुद्र का पानी मंदिर के अंदर पहुंच जाता है. इस प्रकार दिन में दो बार शिवलिंग का जलाभिषेक कर वापस लौट जाता है. यह घटना प्रतिदिन सुबह और शाम को घटित होती है।

ज्वार से कुछ मिनट पूर्व परिसर को करा दिया जाता है खाली:-

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स्थानीय पुजारियों और श्रद्धालुओं के मुताबिक़ स्तंभेश्वर मंदिर में विराजमान भगवान नीलकंठेश्वर का जलाभिषेक करने के लिए स्वयं समुद्र देवता पधारते हैं। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है। उस समय वहां किसी के भी प्रवेश की अनुमति नहीं है। यहां दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए खासतौर से पर्चे बांटे जाते हैं, जिसमें ज्वार-भाटा आने का समय लिखा होता है, ताकि उस वक्त मंदिर में कोई प्रवेश न करे। मंदिर दिन में सुबह और शाम को पल भर के लिए ओझल हो जाता है और कुछ देर बाद उसी जगह पर वापस भी आ जाता है।

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